अमरनाथ यात्रा,पहला जत्था तैयार। सुरक्षा की भी पूरी तरह से निर्देश दिए गए हैं।

Amarnath-cave

अमरनाथ यात्रा,पहला जत्था तैयार। सुरक्षा की भी पूरी तरह से निर्देश दिए गए हैं।

 

अमरनाथ यात्रा भारत के जम्मू और कश्मीर में अमरनाथ गुफा की एक महत्वपूर्ण वार्षिक हिंदू तीर्थयात्रा है, जहाँ भगवान शिव के प्रतीक के रूप में प्राकृतिक रूप से निर्मित बर्फ के लिंग की पूजा की जाती है।

 अमरनाथ यात्रा 2025 के लिए मुख्य विवरण

 यात्रा 3 जुलाई, 2025 को शुरू होगी और 9 अगस्त, 2025 को समाप्त होगी, जो हिंदू कैलेंडर में आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण अवधि श्रावण मास के साथ संरेखित होगी।

स्थान: यह गुफा हिमालय में 3,888 मीटर (12,756 फीट) की ऊँचाई पर स्थित है, जो श्रीनगर से लगभग 141 किमी दूर है, जहाँ पहलगाम (46 किमी) या बालटाल (14 किमी) के माध्यम से पहुँचा जा सकता है।

अवधि: तीर्थयात्रा आमतौर पर 40-45 दिनों तक चलती है, जिसकी सटीक अवधि मौसम और बर्फ के लिंग के निर्माण पर निर्भर करती है।

 आध्यात्मिक महत्व: माना जाता है कि यह गुफा वह जगह है जहाँ भगवान शिव ने देवी पार्वती को अमरता (अमर कथा) का रहस्य बताया था। बर्फ का लिंगम, जो चाँद के साथ बढ़ता और घटता है, एक पवित्र प्रतीक है, जिसके दोनों ओर छोटी बर्फ की संरचनाएँ हैं जो पार्वती और गणेश का प्रतिनिधित्व करती हैं।

 मार्ग

अमरनाथ गुफा तक पहुँचने के लिए दो मुख्य मार्ग हैं:

1. पहलगाम मार्ग:

दूरी: लगभग 36-48 किमी, एक तरफ़ से 3-5 दिन लगते हैं।

पथ: चंदनवारी (पहलगाम से 16 किमी, 9,500 फीट) से शुरू होकर पिस्सू टॉप (11,000 फीट), शेषनाग (11,730 फीट), पंचतरणी (12,000 फीट) और अंत में गुफा तक जाता है।

 विशेषताएँ: अधिक चौड़ी, अधिक धीमी ढलान, बुजुर्ग या शारीरिक रूप से कम स्वस्थ तीर्थयात्रियों के लिए उपयुक्त। टट्टू और पालकी उपलब्ध हैं।

सुंदर आकर्षण: हरी-भरी घाटियों और लिद्दर नदी से होकर गुजरता है।

2. बलटाल मार्ग:

दूरी: 14-16 किमी, 1-2 दिनों में पूरा किया जा सकता है।

पथ: बलटाल (सोनमर्ग से 15 किमी) से शुरू होता है और अधिक खड़ी चढ़ाई है, जिसके लिए अधिक शारीरिक सहनशक्ति की आवश्यकता होती है। टट्टू की अनुमति नहीं है, लेकिन डंडी (ले जाने वाली सीटें) उपलब्ध हैं।

युवा, रोमांच चाहने वाले तीर्थयात्रियों द्वारा पसंद किया जाता है।

3. हेलीकॉप्टर सेवाएँ: बलटाल और पहलगाम से पंचतरणी (गुफा से 6 किमी) तक उपलब्ध, जो ट्रेक करने में असमर्थ लोगों के लिए आदर्श है। अग्रिम बुकिंग आवश्यक है।

तैयारी और सुरक्षा सुझाव

शारीरिक तंदुरुस्ती पर भी ध्यान: सहनशक्ति बढ़ाने और ऑक्सीजन दक्षता में सुधार करने के लिए रोजाना 4-5 किलोमीटर पैदल चलना शुरू करें और एक महीने पहले प्राणायाम/योग का अभ्यास करें।

स्वास्थ्य: अधिकृत डॉक्टरों/संस्थाओं से सीएचसी प्राप्त करें। ऊंचाई की बीमारी, दर्द से राहत और अन्य स्थितियों के लिए दवाएँ साथ रखें।

पैकिंग किस प्रकार करे:

गर्म कपड़े (स्वेटर, जैकेट, ऊनी पतलून), रेनकोट, वाटरप्रूफ ट्रेकिंग जूते और मोज़े साथ में रखें।

टॉयलेटरीज़, ड्राई फ्रूट्स, चॉकलेट और प्राथमिक चिकित्सा किट जैसी ज़रूरी चीज़ें रखें।

फोटो आईडी, पंजीकरण परमिट और आरएफआईडी कार्ड भी साथ में रखे।

सुरक्षा:

बेस कैंप (बालटाल या पहलगाम) में 1-2 दिनों के लिए खुद को ढाल लें।

हाइड्रेटेड रहें (5 लीटर/दिन) और शराब, कैफीन और धूम्रपान से बचें।

समूहों में यात्रा करें, अंधेरे के बाद ट्रेकिंग से बचें और SASB दिशानिर्देशों का पालन करें।

मार्ग पर हर 2 किमी पर मेडिकल पोस्ट उपलब्ध रहेगा।

 

पर्यावरणीय जिम्मेदारी जो यात्रियों को ध्यान रखना चाहिए

कूड़ा-कचरा फैलाने और प्लास्टिक का उपयोग करने से बचें, जो जम्मू और कश्मीर में प्रतिबंधित है।

 

सुविधाएँ

आवास सुविधा: बेस कैंप (बालटाल, पहलगाम) और मार्ग पर टेंट, गेस्टहाउस और आश्रम। amarnathyatrahuts.com जैसे अधिकृत प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से पहले से बुक करें।

परिवहन सुविधा: जम्मू से पहलगाम/बालटाल के लिए सरकारी और निजी बसें। निकटतम रेलवे स्टेशन जम्मू (178 किमी दूर) है। हेलीकॉप्टर सेवाएँ उपलब्ध हैं।

 

सहायता सुविधा: भारतीय सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और स्वयंसेवक सुरक्षा, चिकित्सा सहायता और भोजन स्टॉल, दूरसंचार और बिजली आपूर्ति जैसी सुविधाएँ इत्यादि प्रदान करते हैं।

 

संचार सुविधा: बीएसएनएल 230 रुपये में प्री-लोडेड यात्रा सिम प्रदान करता है।

 

ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व:

 

पौराणिक कथा: यह गुफा उस किंवदंती से जुड़ी है जहाँ भगवान शिव ने पार्वती के साथ अमर कथा साझा की थी, और गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए अपने साथियों (पहलगाम में नंदी, चंदनवारी में चंद्रमा, शेषनाग में सांप, महागुणस में गणेश और पंचतरणी में पाँच तत्व) को पीछे छोड़ दिया था।

 

खोज: ऋषि भृगु (प्राचीन ग्रंथ) या चरवाहे बूटा मलिक (15वीं शताब्दी) को इसका श्रेय दिया जाता है। यात्रा को 1934 में महाराजा हरि सिंह द्वारा औपचारिक रूप दिया गया था।

 

छड़ी मुबारक: सुरक्षा का प्रतीक एक राजदंड, जिसे यात्रा के दौरान ले जाया जाता है, जिसका समापन रक्षा बंधन के दिन गुफा में होता है।

चुनौतियाँ और पिछली घटनाएँ:

 

भूभाग और मौसम: इस यात्रा में उच्च ऊँचाई (महागुनस दर्रे पर 14,000 फीट तक), खड़ी ढलान और अप्रत्याशित मौसम (9-34 डिग्री सेल्सियस) शामिल हैं।

 

सुरक्षा: यात्रा को आतंकवादी हमलों (जैसे, 1995, 2017) और प्राकृतिक आपदाओं (जैसे, 1996 की त्रासदी जिसमें 243 मौतें ठंड के कारण हुईं, 2015 में बादल फटने) का सामना करना पड़ा है। तब से सुरक्षा उपायों को मजबूत किया गया है।

 

पर्यावरणीय प्रभाव: तीर्थयात्रियों की अधिक संख्या के कारण पारिस्थितिकी तंत्र को होने वाले नुकसान के बारे में चिंताएँ हैं, हालाँकि कोई औपचारिक अध्ययन नहीं किया गया है।

 

हाल के अपडेट:

सुरक्षा तैयारियाँ: भारतीय सेना, सीआरपीएफ, जम्मू-कश्मीर पुलिस और जेकेएसडीआरएफ द्वारा एक संयुक्त मॉक भूस्खलन अभ्यास आयोजित किया गया। तीर्थयात्रियों की सुरक्षा के लिए 1 जुलाई, 2025 से मार्गों को नो-फ्लाई ज़ोन घोषित किया गया है।

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