चुनाव आयोग पर उठे सवाल: मतदाता सूची से बड़ा भरोसे का सवाल…

ख़बर भारत की- 25 सितंबर 2026, दिल्ली।

 

चुनाव आयोग पर उठे सवाल: मतदाता सूची से बड़ा भरोसे का सवाल।

 

दो चुनाव आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों ने बढ़ाई चिंता, आयोग का दावा—SIR समेत सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए।

लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह जनता के विश्वास की सबसे बड़ी संवैधानिक परीक्षा भी है। इसलिए जब देश में चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था—भारत निर्वाचन आयोग—के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल सामने आएं, तो उन्हें महज राजनीतिक बयानबाजी मानकर टालना उचित नहीं होगा। ऐसे सवालों का जवाब भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि तथ्यों, दस्तावेजों और पारदर्शी प्रक्रिया से मिलना चाहिए।

 

सितंबर 2026 में सामने आई एक रिपोर्ट ने निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेदों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। द इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग दस महीनों में कम-से-कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट के मुताबिक इन आपत्तियों में मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, Form-6, मतदाता डेटाबेस के IT नियंत्रण तथा पश्चिम बंगाल में मतदाता अपीलों जैसे विषय शामिल थे।

 

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मामला केवल दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद का नहीं है। प्रश्न उस संस्था की कार्यप्रणाली का है, जिसे संविधान ने देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी दी है।

 

सवाल SIR से आगे का है

विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR पिछले कुछ समय से राजनीतिक और न्यायिक बहस का विषय रहा है। मतदाता सूची को अद्यतन करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की सामान्य आवश्यकता है। मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नामों को हटाना और पात्र नागरिकों के नाम जोड़ना चुनाव प्रक्रिया की शुचिता के लिए आवश्यक है।

लेकिन इसी प्रक्रिया में यदि किसी पात्र नागरिक का नाम छूट जाए तो समस्या केवल प्रशासनिक गलती नहीं रह जाती। उसका सीधा असर उस नागरिक के मतदान के अधिकार पर पड़ सकता है।

यही कारण है कि मतदाता सूची से जुड़े हर बदलाव में नोटिस, सुनवाई, अपील और पारदर्शी डिजिटल रिकॉर्ड का महत्व बढ़ जाता है।

मतदाता सूची लोकतंत्र की आधारभूत सूची है। इसमें एक नाम का होना या न होना किसी नागरिक के लिए केवल सरकारी रिकॉर्ड का विषय नहीं, बल्कि उसके लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

 

14 आपत्तियों का जवाब जरूरी क्यों?

 

यदि दो चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मौकों पर लिखित आपत्तियां दर्ज की हैं, तो लोकतंत्र के हित में यह जानना जरूरी है कि उन आपत्तियों में क्या कहा गया और उन पर आयोग ने क्या कार्रवाई की।

 

दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग की ओर से यह कहा गया है कि SIR सहित सभी निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से और सर्वसम्मति से लिए गए।

 

यानी सार्वजनिक विमर्श के सामने फिलहाल दो महत्वपूर्ण तथ्य हैं—एक ओर लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट और दूसरी ओर आयोग का यह स्पष्टीकरण कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए।

 

ऐसे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित दस्तावेजों और निर्णय प्रक्रिया को सार्वजनिक रूप से समझना जरूरी है।

 

लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल इस बात से नहीं बनती कि वे अपने निर्णय को सही बताएं। विश्वसनीयता तब मजबूत होती है, जब वे यह भी स्पष्ट करें कि निर्णय किस प्रक्रिया से लिया गया और असहमति की स्थिति में उसका समाधान कैसे हुआ।

 

CEC अकेले फैसला कर सकते हैं?

 

यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न है।

 

2023 के कानून के तहत निर्वाचन आयोग के कामकाज में सर्वसम्मति को प्राथमिकता दी गई है और मतभेद की स्थिति में बहुमत के आधार पर निर्णय की व्यवस्था है। ऐसे में CEC और दोनों चुनाव आयुक्तों की भूमिका को समझना जरूरी है।

 

इसलिए बहस को केवल इस सवाल तक सीमित करना कि “CEC सही हैं या चुनाव आयुक्त?” वास्तविक मुद्दे को छोटा कर देगा।

 

असल सवाल इससे बड़ा है—

 

निर्णय कैसे हुआ?

किस आधार पर हुआ?

किसने आपत्ति की?

आपत्ति पर क्या निर्णय हुआ?

क्या असहमति को रिकॉर्ड किया गया?

और पूरी प्रक्रिया का दस्तावेजी रिकॉर्ड कहां है?

 

इन सवालों के स्पष्ट उत्तर किसी व्यक्ति विशेष की प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बल्कि निर्वाचन आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता के लिए जरूरी हैं।

 

चुनाव आयोग की सबसे बड़ी पूंजी—जनता का भरोसा

 

निर्वाचन आयोग के पास राजनीतिक सत्ता नहीं होती, लेकिन उसकी संवैधानिक विश्वसनीयता लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है।

 

सरकारें आती-जाती हैं। राजनीतिक दल चुनाव जीतते और हारते हैं। लेकिन चुनाव कराने वाली संस्था की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा कमजोर होता है तो उसका प्रभाव किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं रहता।

 

इसलिए निर्वाचन आयोग को केवल चुनाव कराने वाली संस्था के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास के संरक्षक के रूप में देखना होगा।

 

विपक्ष आयोग पर सवाल उठा सकता है। सत्ता पक्ष आयोग का बचाव कर सकता है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप चलते रहेंगे। लेकिन निर्वाचन आयोग को इन राजनीतिक बहसों से ऊपर रहकर तथ्यों और प्रक्रिया के माध्यम से जवाब देना चाहिए।

 

क्योंकि चुनाव में हार-जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि जनता को यह विश्वास रहे कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी थी।

 

अब पारदर्शिता ही रास्ता है

इस विवाद का समाधान किसी राजनीतिक नारे में नहीं है। किसी व्यक्ति के इस्तीफे की मांग भी अपने आप में इस संस्थागत सवाल का समाधान नहीं है।

 

समाधान है—तथ्यों की सार्वजनिक जांच और प्रक्रिया की पारदर्शिता।

 

यदि 14 लिखित आपत्तियां दर्ज हुई हैं, तो उनकी विषय-वस्तु और उन पर हुई कार्रवाई को यथासंभव सार्वजनिक किया जाना चाहिए। यदि सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए हैं, तो संबंधित रिकॉर्ड इस बात को स्पष्ट कर सकते हैं। यदि किसी प्रक्रिया में तकनीकी या प्रशासनिक समस्या सामने आई, तो उसका समाधान भी पारदर्शी तरीके से होना चाहिए।

 

यह केवल निर्वाचन आयोग का सवाल नहीं है। यह हर उस नागरिक का सवाल है, जिसके हाथ में चुनाव के दिन एक वोट होता है।

 

मतदाता सूची में एक नाम का जुड़ना या हटना कागज पर छोटी प्रशासनिक घटना लग सकती है, लेकिन उस नाम के पीछे एक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार होता है।

 

इसलिए चुनाव आयोग से सवाल पूछना लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है।

 

बल्कि संस्थाओं से पारदर्शिता मांगना लोकतंत्र को मजबूत करने की प्रक्रिया है।

 

आज जरूरत किसी संस्था को कमजोर करने की नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता को और मजबूत करने की है।

 

क्योंकि अंततः चुनाव केवल वोटों की गिनती नहीं है।

चुनाव उस भरोसे का नाम है जिसमें हारने वाला भी परिणाम स्वीकार करता है और जीतने वाला भी यह जानता है कि उसकी जीत एक विश्वसनीय और निष्पक्ष प्रक्रिया से हुई है।

 

जब चुनाव आयोग पर सवाल उठें, तो जवाब इतना स्पष्ट, तथ्यपूर्ण और पारदर्शी होना चाहिए कि सवाल पूछने वाले और जवाब सुनने वाले—दोनों का लोकतंत्र पर भरोसा और मजबूत हो।

 

क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत किसी दल की जीत नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की जीत है।

 

सुमित कुमार मिश्र

पत्रकार | अधिवक्ता | लेखक

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