मिथिला की दीपावली : हुक्का-पाती की लौ में जीवित है लोकसंस्कृति, आस्था और सामाजिक नीति की अनूठी परंपरा….

🇮🇳 ख़बर भारत की-8 नवंबर,2026, नई दिल्ली |
दीपावली केवल दीपों का उत्सव नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक चेतना, पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, पारिवारिक एकता और लोकजीवन की समृद्ध विरासत का प्रतीक है। हुक्का-पाती, पितरों की विदाई और सूप पीटने जैसी परंपराएं आज भी मिथिलांचल की विशिष्ट पहचान को जीवंत बनाए हुए हैं।
नई दिल्ली | 8 नवंबर 2026 | ख़बर भारत की
भारत विविधताओं का देश है। यहां प्रत्येक पर्व और त्योहार अपने साथ धार्मिक आस्था, सामाजिक संदेश और सांस्कृतिक विरासत लेकर आता है। दीपावली भी ऐसा ही महापर्व है, जो अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय का संदेश देता है। लेकिन भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में दीपावली मनाने की अपनी विशिष्ट परंपराएं हैं। इन्हीं में मिथिला की दीपावली का स्वरूप अत्यंत अनूठा और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध है। यहां दीपोत्सव की पहचान केवल दीप जलाने, लक्ष्मी-गणेश की पूजा और घरों को सजाने तक सीमित नहीं है, बल्कि हुक्का-पाती, पितरों की विदाई, सूप पीटने और पारंपरिक लोकगीतों में भी इसकी आत्मा दिखाई देती है।
मिथिला की लोकसंस्कृति में दीपावली का विशेष स्थान है। यहां की परंपराएं बताती हैं कि त्योहार केवल व्यक्तिगत खुशियों का अवसर नहीं, बल्कि परिवार, समाज और पूर्वजों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने का माध्यम भी हैं। इन परंपराओं के पीछे धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश भी छिपे हैं।
हुक्का-पाती : मिथिला की दीपावली की विशिष्ट पहचान
मिथिला की दीपावली की चर्चा हुक्का-पाती के बिना अधूरी है। यह सदियों से चली आ रही एक लोकप्रिय लोकपरंपरा है। लोकमान्यता के अनुसार दीपावली की रात हुक्का-पाती जलाकर घर के प्रत्येक हिस्से में घुमाने से दरिद्रता और नकारात्मकता का निष्कासन होता है तथा लक्ष्मी के आगमन का मार्ग प्रशस्त होता है।
लक्ष्मी-गणेश की पूजा संपन्न होने के बाद परिवार के सदस्य इस परंपरा में सम्मिलित होते हैं। घर के बड़े-बुजुर्ग बच्चों को इसकी विधि समझाते हैं। इस प्रकार एक धार्मिक परंपरा के साथ-साथ सांस्कृतिक शिक्षा की प्रक्रिया भी चलती रहती है।
शंठी और कपड़े से तैयार होती है हुक्का-पाती
मिथिला में पारंपरिक रूप से हुक्का-पाती तैयार करने की दो प्रमुख विधियां प्रचलित हैं।
पहली शंठी वाली हुक्का-पाती : इसे शंठी और खर की सहायता से तैयार किया जाता है। खर को चारों ओर रखकर बीच में शंठी रखी जाती है और उसे बांधकर मशाल जैसा स्वरूप दिया जाता है। परंपरा के अनुसार सबसे पहले इसी हुक्का-पाती का उपयोग किया जाता है। इसे जलाकर घर के विभिन्न हिस्सों में घुमाया जाता है।
दूसरी कपड़े वाली हुक्का-पाती : पुराने कपड़ों को एकत्र कर उन्हें मोड़कर या लपेटकर लकड़ी अथवा डंडे के सहारे बांधा जाता है। इससे जलाने योग्य हुक्का-पाती तैयार होती है। शंठी वाली हुक्का-पाती के उपयोग के बाद कपड़े वाली हुक्का-पाती जलाई जाती है। दोनों विधियां मिथिला की पारंपरिक लोककला और घरेलू संसाधनों के उपयोग का परिचय देती हैं।
‘लक्ष्मी घर, दरिद्र बाहर’ : समृद्धि का सामूहिक उद्घोष
हुक्का-पाती की परंपरा का सबसे आकर्षक पक्ष इसका सामूहिक उद्घोष है। पूजा घर में प्रज्वलित पवित्र दीपक से परिवार के पुरुष सदस्य अपनी-अपनी हुक्का-पाती में अग्नि प्रज्वलित करते हैं। इसके बाद जलती हुई हुक्का-पाती लेकर घर के कमरों, कोनों, दरवाजों और आंगन में जाते हैं। इस दौरान परिवार के सदस्य एक स्वर में उद्घोष करते हैं— ‘लक्ष्मी घर, दरिद्र बाहर।’
इस छोटे से वाक्य में जीवन की बड़ी कामना समाहित है।
हर परिवार चाहता है कि उसके घर में धन-धान्य, सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि बनी रहे तथा अभाव, बीमारी और दुख दूर हों। घर के प्रत्येक कोने में हुक्का-पाती ले जाने का भाव यह है कि खुशहाली केवल पूजा स्थल तक सीमित न रहे, बल्कि परिवार के प्रत्येक सदस्य के जीवन में पहुंचे।
यह परंपरा हमें सामूहिकता का भी संदेश देती है।
जब पूरा परिवार एक साथ इस लोकाचार में भाग लेता है, तब त्योहार केवल धार्मिक आयोजन न रहकर पारिवारिक एकता का उत्सव बन जाता है।
पितरों की विदाई : पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता
मिथिला की दीपावली में पितरों की विदाई की परंपरा भी विशेष महत्व रखती है। लोकविश्वास के अनुसार पितृपक्ष में पूर्वजों का आगमन होता है और दीपावली के अवसर पर उन्हें सम्मानपूर्वक विदाई दी जाती है। कई क्षेत्रों में हुक्का-पाती अथवा जलती हुई शंठी लेकर घर से बाहर तक जाने की परंपरा को पितरों के प्रस्थान से जोड़ा जाता है।
इस परंपरा का सांस्कृतिक संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जिस परिवार की नई पीढ़ी अपने पूर्वजों को याद रखती है, वह अपने इतिहास और संस्कारों से जुड़ी रहती है। आधुनिक जीवन में हम भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में अक्सर अपने पारिवारिक मूल्यों को भूल जाते हैं। ऐसे में पितरों की विदाई हमें अपनी जड़ों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की प्रेरणा देती है।
सूप पीटने की परंपरा : अभाव से समृद्धि की ओर
मिथिला की दीपावली से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा सूप पीटने की है। दीपावली की रात के बाद प्रातःकाल महिलाएं सूप और डंठल की सहायता से प्रतीकात्मक रूप से दरिद्रता को घर से बाहर करने की परंपरा निभाती हैं। इस दौरान पारंपरिक लोकगीत और उद्घोष सुनाई देते हैं।
सूप केवल बांस से बना घरेलू उपकरण नहीं है, बल्कि मिथिला की कृषि और अन्न-संस्कृति का महत्वपूर्ण प्रतीक है। इसी सूप से अनाज की सफाई और फटकाई की जाती रही है। इसलिए इसे दरिद्रता दूर करने की परंपरा से जोड़ना अन्न, श्रम और समृद्धि के प्रति समाज की आकांक्षा को दर्शाता है।
इस लोकाचार का मूल संदेश है कि घर में अन्न की कमी न हो, परिवार खुशहाल रहे और जीवन में आर्थिक संपन्नता आए। इसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी मिथिला के पारिवारिक और सांस्कृतिक जीवन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित करती है।
लोकपरंपराओं में छिपी सामाजिक नीति
मिथिला की इन परंपराओं को केवल धार्मिक कर्मकांड मानना उचित नहीं होगा। इनके भीतर सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने के अनेक सूत्र मौजूद हैं। हुक्का-पाती सामूहिकता का संदेश देती है, पितरों की विदाई कृतज्ञता का संस्कार सिखाती है और सूप पीटने की परंपरा अन्न तथा श्रम के महत्व को समझाती है।
इन लोकपरंपराओं के माध्यम से परिवार की एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत सौंपती है। यहां त्योहार के अवसर पर बच्चों को केवल मिठाइयां और नए कपड़े नहीं मिलते, बल्कि उन्हें अपनी मिट्टी, भाषा, लोकविश्वास और पारिवारिक इतिहास को समझने का अवसर भी मिलता है।
यही किसी जीवंत संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह पुस्तकों और अभिलेखों में ही नहीं, बल्कि आम लोगों के दैनिक जीवन और व्यवहार में भी सुरक्षित रहती है।
आधुनिकता के दौर में लोकसंस्कृति बचाने की चुनौती
आज दीपावली का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। बाजारवाद, आधुनिक सजावट, बिजली की झालरों और आतिशबाजी के बीच पारंपरिक लोकाचार धीरे-धीरे पीछे छूटते जा रहे हैं। शहरी जीवन में पले-बढ़े अनेक बच्चों को हुक्का-पाती और सूप पीटने जैसी परंपराओं की जानकारी तक नहीं है।
यह स्थिति केवल मिथिला की नहीं, बल्कि देश की अनेक क्षेत्रीय संस्कृतियों के सामने उपस्थित चुनौती है। विकास और आधुनिकता आवश्यक हैं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान को भुलाकर विकास की कल्पना अधूरी है। आवश्यकता इस बात की है कि परिवार के बुजुर्ग बच्चों को इन परंपराओं का महत्व बताएं, सांस्कृतिक संस्थाएं इनका दस्तावेजीकरण करें और विद्यालयों में स्थानीय लोकसंस्कृति से संबंधित गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाए।
साथ ही, हुक्का-पाती जलाने के दौरान आग से सुरक्षा, बच्चों की निगरानी और पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखना भी जरूरी है। परंपरा का संरक्षण विवेक और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए।
लोकसंस्कृति ही मिथिला की वास्तविक पहचान
मिथिला की पहचान केवल उसकी ऐतिहासिक विरासत, विद्यापति की रचनाओं, मधुबनी चित्रकला और मैथिली भाषा से ही नहीं बनती, बल्कि उन छोटे-छोटे लोकाचारों से भी बनती है, जो पीढ़ियों से समाज के जीवन का हिस्सा रहे हैं। हुक्का-पाती की लौ इसी सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है।
आज आवश्यकता है कि हम अपनी परंपराओं को केवल याद न करें, बल्कि उन्हें समझें, उनके सामाजिक महत्व को पहचानें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं। जिस समाज को अपनी जड़ों पर गर्व होता है, वह समय के बदलाव के बावजूद अपनी पहचान सुरक्षित रखता है।
मिथिला की दीपावली का वास्तविक संदेश यही है कि घर में केवल दीपक नहीं जलने चाहिए, बल्कि रिश्तों में अपनापन, परिवार में एकता, समाज में समरसता और जीवन में संस्कारों का प्रकाश भी बना रहना चाहिए। हुक्का-पाती की लौ हमें यही याद दिलाती है कि संस्कृति केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे मूल्यवान विरासत है।
सुमित कुमार मिश्र
अधिवक्ता | पत्रकार | लेखक
लेखक — नवभारत का न्याय दर्शन
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